जय शिव ओंकार.
एक पल के लिए आँखें बंद करिए। एक गहरी साँस लीजिए। और कहिए — ओम।
महसूस करिए। यह कहाँ से शुरू होता है। पेट की गहराई से। फिर छाती से उठता है। गले में कंपन करता है। खोपड़ी में गूँजता है। और फिर शांति में विलीन हो जाता है।
पेट से शांति तक की यह यात्रा — यही पूरी सृष्टि की यात्रा है। सृजन से विलय तक। ध्वनि से मौन तक। शिव से शिव तक।
क्योंकि ओम केवल एक ध्वनि नहीं है। इतिहास के सबसे प्राचीन शास्त्रों के अनुसार — ओम स्वयं भगवान शिव हैं। और यही है जय शिव ओंकार का अर्थ। जय हो उस शिव की जो पवित्र ब्रह्मांडीय ध्वनि ओम हैं।
माण्डूक्य उपनिषद क्या कहता है
प्राचीन माण्डूक्य उपनिषद — जो सबसे अधिक पूजनीय उपनिषदों में से एक है — अपने पहले ही श्लोक में कुछ असाधारण कहता है। वो कहता है — संपूर्ण भूत, संपूर्ण वर्तमान और संपूर्ण भविष्य ओम के भीतर समाहित है। और जो काल से परे है वो भी ओम ही है। दूसरे शब्दों में — जो कुछ भी हुआ है, जो अभी है और जो होगा — सब ओम है। सब शिव ओंकार है।

यह कोई काव्यात्मक रूपक नहीं है। उपनिषदों के ऋषि सटीक विचारक थे। उनका आशय शाब्दिक था। ओम अस्तित्व की ध्वनि है।
पाणिनि और शिव के डमरू की कथा
कुछ शिव भक्त एक ऐसी कथा सुनाते हैं — जो संस्कृत व्याकरण परंपरा से जुड़ी मानी जाती है।
महान वैयाकरण पाणिनि लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में हुए। उन्हें मानव इतिहास के सबसे महान भाषाई प्रतिभाओं में से एक माना जाता है। उनकी रचना अष्टाध्यायी — जिसमें लगभग चार हज़ार सूत्र हैं — इतनी सटीक और इतनी संपूर्ण है कि आधुनिक भाषाविद् आज भी इसका अध्ययन विस्मय के साथ करते हैं।
लेकिन कुछ विवरणों के अनुसार — पाणिनि ने यह व्याकरण अकेले नहीं बनाया। उन्हें यह प्राप्त हुआ।
कथा के अनुसार — पाणिनि गहरी समाधि और तपस्या में बैठे थे। वो भाषा के मूल स्रोत को खोज रहे थे। उनकी तपस्या के चरमोत्कर्ष पर भगवान शिव ने उनके समक्ष तांडव किया। नृत्य करते हुए शिव ने अपना डमरू चौदह बार हिलाया। उन चौदह बार से चौदह विशिष्ट ध्वनियाँ निकलीं। ये चौदह ध्वनियाँ — जिन्हें महेश्वर सूत्र या शिव सूत्र कहा जाता है — इनमें संस्कृत की संपूर्ण ध्वनि-संरचना समाहित थी। हर स्वर। हर व्यंजन। मानव वाणी को नियंत्रित करने वाला हर नियम।
पाणिनि ने ये चौदह ध्वनियाँ सुनीं। और उनसे संस्कृत का संपूर्ण व्याकरण रचा — वो भाषा जिसमें वेद, उपनिषद, पुराण और भारत का समस्त शास्त्रीय ज्ञान संरक्षित है।
कुछ शिव भक्तों के अनुसार — इसका अर्थ यह है कि वेदों का हर शब्द, पुराणों का हर मंत्र, उपनिषदों की हर दार्शनिक अंतर्दृष्टि — यह सब शिव के हाथ में उस छोटे से डमरू के चौदह झटकों तक जाकर मिलती है।
यही है शिव ओंकार। वो ध्वनि जिसने केवल पौराणिक अर्थ में नहीं — बल्कि इस परंपरा के अनुसार शाब्दिक रूप से — उस भाषा की संरचना की जिसमें मानव ज्ञान का समस्त भंडार संरक्षित है।
जब आप ओम का जप करती हैं तो इसका क्या अर्थ है
जब आप ओम नमः शिवाय जपती हैं — आप ओम से शुरू करती हैं। यह संयोग नहीं है। ओम से शुरू करके आप सृष्टि के मूल स्रोत से शुरू करती हैं। उस पहले क्षण तक जाती हैं। उस बिंदु पर खड़ी हो जाती हैं जहाँ शिव ने डमरू हिलाया और सब कुछ शुरू हुआ।
इसीलिए डमरू हमेशा शिव के हाथ में दिखाया जाता है। यह केवल वाद्य यंत्र नहीं है। यह सृष्टि का उपकरण है। जब भी शिव को डमरू के साथ देखें — याद करें। जिस ब्रह्मांड में आप रहती हैं, जो हवा आप साँस लेती हैं, जिस भाषा में आप सोचती हैं, जिन शब्दों से आप प्रार्थना करती हैं — यह सब उसी छोटे से डमरू से आया।
कुछ वैज्ञानिक जो ध्वनि और ब्रह्मांड विज्ञान का अध्ययन करते हैं वो कहते हैं कि ब्रह्मांड मौन नहीं है — अंतरिक्ष स्वयं एक पार्श्व कंपन के साथ गूँजता है। कुछ विवरणों के अनुसार यह ब्रह्मांडीय गुंजन ओम से मिलता-जुलता है। विज्ञान इसे पूरी तरह सिद्ध करे या न करे — उपनिषदों के ऋषियों ने इस सत्य को अपनी अंतर्दृष्टि से हज़ारों वर्ष पहले जान लिया था।
जय शिव ओंकार और ओम नमः शिवाय को एक साथ जपना एक अत्यंत शक्तिशाली अभ्यास है। जय शिव ओंकार आपकी चेतना को सृष्टि के पीछे की ब्रह्मांडीय ध्वनि के रूप में शिव तक खोलता है। ओम नमः शिवाय उस ब्रह्मांडीय चेतना को व्यक्तिगत भक्ति में बदलता है। दोनों मिलकर आपको विशाल ब्रह्मांडीय से अंतरंग व्यक्तिगत तक ले जाते हैं। अनंत से प्रिय तक।
अगली बार जब ओम जपें — एक पल रुकिए। डमरू को याद करिए। पाणिनि को याद करिए जो समाधि में बैठे थे और वो चौदह ध्वनियाँ सुन रहे थे। याद करिए कि आपके मुख में अभी जो ओम है — वही ध्वनि है जिससे यह सब — सब कुछ — शुरू हुआ था।
इस कथा का आधार संस्कृत व्याकरण परंपरा और महेश्वर सूत्रों की परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कुछ विवरण भक्ति परंपरा में इस प्रकार सुनाए जाते हैं।
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