इस श्रृंखला में अब तक हर मंत्र एक नमस्कार रहा है।
रुद्र को नमस्कार। नीलकंठ को। गिरिजापति को। परमेश्वर को।
एक भक्त है। एक परमात्मा है। और झुकने का भाव — दोनों के बीच का सेतु।
यह मंत्र वो सेतु हटा देता है।
इसलिए नहीं कि भक्ति नहीं रही। बल्कि इसलिए — क्योंकि इस मंत्र में भक्त कुछ ऐसा खोजता है जिससे सेतु की ज़रूरत ही नहीं रहती।
जो झुक रहा है और जिसे झुककर प्रणाम किया जा रहा है — वो एक ही हैं।
शिव — शुभ, शाश्वत, समस्त सत्ता का आधार। अहम् — मैं। शिवोऽहम् — मैं शिव हूँ।
यह अहंकार का दावा नहीं है। शक्ति की घोषणा नहीं। यह सबसे शांत, सबसे पूर्ण, सबसे गहरी पहचान है जिस तक एक मानव चेतना पहुँच सकती है — वो पहचान कि जिसे खोजा जा रहा था वो कभी खोजने वाले से अलग नहीं था।

शिवोऽहम् का अर्थ
अद्वैत वेदांत परंपरा में — वो परंपरा जिसे आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में असाधारण दार्शनिक स्पष्टता से व्यवस्थित किया — हर व्यक्तिगत चेतना की मूलभूत प्रकृति परम सत्य के समान है। आत्मन् ब्रह्म है। व्यक्तिगत आत्मा सार्वभौमिक आत्मा है। समान नहीं। जुड़ी हुई नहीं। समान।
शैव अभिव्यक्ति में — शिवोऽहम्। मैं शिव हूँ। पर्याप्त भक्ति के माध्यम से मैं शिव बन जाऊँगा — नहीं। मैं शिव जैसा हूँ — नहीं। मैं शिव के निकट हूँ — नहीं। यह पहचान कि वो जागरूकता जो अभी इन शब्दों को पढ़ रही है — वही जागरूकता है जो समस्त अस्तित्व की नींव है।
इस पहचान की एक कविता है। और उस कविता की एक कहानी।
निर्वाण षट्कम् की कथा — शंकरदिग्विजय से
माधवाचार्य रचित शंकरदिग्विजय में संरक्षित विवरणों के अनुसार — युवा शंकराचार्य बहुत छोटी उम्र में घर छोड़कर संन्यासी बन गए थे। उन्होंने सब छोड़ दिया था। नाम। वंश। परिवार। सम्पत्ति। वो चलते रहे। भटकते रहे। एक गुरु की तलाश में जो उस पहचान तक ले जाए जिसकी ओर उनका सारा ज्ञान इशारा करता था लेकिन अभी तक दिलाया नहीं था।
वो नर्मदा नदी के तट पर आए।
नदी के किनारे — एक गुफा में — गोविंदपाद नाम के एक महान ऋषि रहते थे। सर्वोच्च कोटि के गुरु। जिनकी उपस्थिति में अस्तित्व के मूलभूत प्रश्न तर्क से नहीं बल्कि कमरे में जागरूकता की शुद्ध गुणवत्ता से उत्तरित हो जाते थे।
युवा शंकराचार्य गोविंदपाद की उपस्थिति में आए।
ऋषि ने उन्हें देखा। और एक प्रश्न पूछा।
नाम क्या है — नहीं। कहाँ से आए — नहीं। क्या चाहते हो — नहीं।
प्रश्न इन सब से सरल और अधिक पूर्ण था।
उन्होंने पूछा — तुम कौन हो?
कुछ विवरणों के अनुसार युवा बालक एक पल के लिए शांत खड़ा रहा। फिर उत्तर दिया। अपने नाम से नहीं। वंश या ज्ञान से नहीं।
उसने छह पदों से उत्तर दिया।
पहला पद शुरू हुआ — मैं मन नहीं हूँ, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं, स्मृति नहीं। मैं कान नहीं, जीभ नहीं, नासिका नहीं, नेत्र नहीं। मैं आकाश नहीं, पृथ्वी नहीं, अग्नि नहीं, वायु नहीं, जल नहीं। मैं शुद्ध चेतना और आनंद हूँ। मैं शिव हूँ। शिवोऽहम्। शिवोऽहम्।
हर पद एक और परत हटाता गया — क्या नहीं है। शरीर नहीं। इंद्रियाँ नहीं। मन नहीं। कोई भी वस्तु नहीं जिसे देखा या वर्णित किया जा सके।
और हर परत हटने के बाद — क्या बचा?
शिवोऽहम्। शिवोऽहम्।
वही जागरूकता। वही चेतना। वही सत्ता का आधार जिसका न आरंभ है न अंत।
गोविंदपाद ने सभी छह पद सुने।
कुछ विवरणों के अनुसार — जब बालक रुका, ऋषि बहुत देर तक मौन रहे। फिर एक शब्द बोला।
आओ।
उन्होंने शिष्य को पहचान लिया। स्वीकार किया।
और भटकते बालक को वो गुरु मिला जिसकी ओर वो चलता रहा था। इसलिए नहीं कि गुरु ने उसे कुछ दिया। बल्कि इसलिए — कि गुरु ने उसकी पुष्टि की जो बालक के अपने छह पदों ने पहले ही घोषित कर दिया था।
शिवोऽहम्।
निर्वाण षट्कम् — वो छह पद जो नर्मदा के तट पर सबसे सरल और सबसे पूर्ण प्रश्न के उत्तर में रचे गए — भारतीय दार्शनिक साहित्य की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक बन गए।
और इसीलिए… ऐसा माना जाता है… कि ॐ शिवोऽहम् अन्य मंत्रों की तरह नहीं जपा जाता। यह निवेदन नहीं है। प्रार्थना नहीं। दूर से झुकना नहीं।
यह उस क्षण का मंत्र है जब दूरी ही देख ली जाती है।
जब भक्त पहचानता है — जो झुक रहा था और जिसे प्रणाम किया जा रहा था — वो कभी दो नहीं थे।
यही है शिवोऽहम्।
इस विवरण का मूल आधार माधवाचार्य रचित शंकरदिग्विजय और आदि शंकराचार्य की निर्वाण षट्कम् से जुड़ा माना जाता है। कुछ विवरण और आंतरिक अनुभव भक्ति परंपरा में इस प्रकार सुनाए जाते हैं।
क्या आप शिव के मंत्र हर वक्त सुनना चाहते हैं? तो MySacredSolutions.in पर विभिन्न sacred games खेलिए — जिन्हें खेलते-खेलते आप शिव मंत्रोच्चार भी कर सकते हैं।
Play Sacred Games — and chant sacred names with every move.