ॐ ईशानाय नमः (Om Ishanay Namah) – शिव का वो 1 सर्वोच्च मुख जो सब देखता है.

एक ऐसे मुख की कल्पना करिए जो न बाएँ देखता है, न दाएँ, न आगे, न पीछे।

जो ऊपर देखता है।

संसार से दूर नहीं। संसार से बचकर नहीं। बल्कि संसार के ऊपर — उसे एक साथ, सभी दिशाओं में, एक ऐसे दृष्टिकोण से देखता है जो सृष्टि के भीतर का कोई प्राणी नहीं पा सकता।

यही है ईशान। शिव का सर्वोच्च मुख। पंचब्रह्म में से पाँचवाँ और सर्वोच्च — शिव के पाँच पवित्र मुख जो शिव महापुराण और प्राचीन शैव आगमों में वर्णित हैं।

शिव के पाँच मुख हैं। सद्योजात पश्चिम की ओर — सृष्टि और नई शुरुआत का मुख। वामदेव उत्तर की ओर — संरक्षण और सौंदर्य का मुख। अघोर दक्षिण की ओर — रूपांतरण और विघटन का उग्र मुख। तत्पुरुष पूर्व की ओर — कृपा और मुक्ति का मुख। और ईशान ऊपर की ओर — आकाश की ओर, अनंत की ओर, उस दिशा की ओर जिसकी कोई दिशा नहीं क्योंकि वो सभी दिशाओं को अपने भीतर समेटती है।

ईश का अर्थ है स्वामी, पूर्ण शासक। ना एक प्रत्यय है — जो पूर्ण उपस्थिति को दर्शाता है। ईशान — वो पूर्ण स्वामी जो ऊपर से सब कुछ देखता है। जिसकी दृष्टि संपूर्ण है। जिससे कुछ भी छिपा नहीं क्योंकि हर दिशा एक साथ उसकी दृष्टि में है।

ॐ ईशानाय नमः। मैं उसे नमस्कार करता हूँ जो सब देखता है।

कैलाश पर रावण की कथा — शिव महापुराण से

शिव महापुराण और वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड में वर्णित कथाओं के अनुसार — एक बार एक ऐसा राजा था जिसकी महानता तीनों लोकों में अतुलनीय थी।

उसका नाम था रावण।

रावण केवल एक खलनायक नहीं था। रामायण की घटनाओं से पहले रावण एक असाधारण विद्वान था — वेदों का पारंगत, संस्कृत काव्य का रचयिता, असाधारण संगीतज्ञ, वो शासक जिसकी लंका स्वर्ण से चमकती थी और जिसकी सेना से देवता भी चिंतित रहते थे। वो शिव का एक समर्पित भक्त था। उसकी भक्ति सच्ची थी। उसका ज्ञान सच्चा था। उसकी शक्ति सच्ची थी।

लेकिन रावण में एक दोष था जो बाकी सब को नष्ट कर देता था।

उसका अहंकार उसकी महानता जितना ही विशाल था।

एक दिन — अपनी शक्ति के नशे में और तीनों लोकों को अपनी शक्ति दिखाने की इच्छा में — रावण कैलाश पर्वत के पास आया। उसने तय किया कि वो पर्वत उठाएगा। कैलाश को ही लंका ले जाएगा। सृष्टि को दिखाएगा कि महादेव का घर भी रावण के हाथों से हिल सकता है।

वो झुका। उसने अपनी बीस भुजाएँ कैलाश की जड़ों के नीचे रखीं। और शिव महापुराण की कथाओं के अनुसार — उसने उठाना शुरू किया।

कैलाश काँपा। पर्वत हिला। कैलाश की नदियाँ अपने मार्ग से बिखर गईं। वृक्षों से फल झड़ गए। पार्वती — उस कंपन से चौंककर — शिव की बाँह थाम लीं।

शिव ने नीचे देखा। उन्होंने रावण की बीस भुजाएँ देखीं जो कैलाश की जड़ों के नीचे ज़ोर लगा रही थीं। उन्होंने रावण के चेहरे पर अहंकार देखा।

और उन्होंने — एक अँगूठे से — दबा दिया।

बस एक अँगूठा।

उस एक इशारे का भार काफी था। कैलाश नीचे आ गया। रावण की बीस भुजाएँ — वो भुजाएँ जिन्होंने स्वयं देवताओं को पराजित किया था — पर्वत के नीचे दब गईं। वो हिल नहीं सकता था। साँस नहीं ले सकता था। तीनों लोकों का सबसे महान राजा पूरी तरह, निरपेक्ष रूप से, असहाय होकर स्थिर था।

कुछ विवरणों के अनुसार वो हज़ार वर्षों तक कैलाश के नीचे फँसा रहा। उसके अहंकार ने उसे — जो सबसे शक्तिशाली प्राणी था — पूर्ण गतिहीनता में ला दिया था।

और फिर कुछ ऐसा हुआ जो कोई भी शक्ति उत्पन्न नहीं कर सकती थी।

उस पूर्ण असहायता में — दबा हुआ, साँस रुकी, एक उँगली भी न हिला सकता — रावण ने ऊपर देखा।

कुछ शिव भक्तों के अनुसार — जब रावण ने ऊपर देखा तो उसने ईशान को देखा। शिव का सर्वोच्च मुख। वो मुख जो ऊपर से सारी सृष्टि को पूर्ण दृष्टि से देखता है। वो मुख जिसने रावण का अहंकार शुरू से देखा था। जिसने उस अहंकार को पूरी तरह खेलने दिया। और जो अब — रावण को देख रहा था। न क्रोध से। न तिरस्कार से। बस — देख रहा था। उसे पूरी तरह। उसकी महानता भी। उसका अहंकार भी। उसका भय भी। और वो सच्चा प्रेम भी जो हमेशा से सब के नीचे था।

Om Ishanaya Namah – Salutations to Ishan, the Supreme Ruler and Divine Form of Shiva
Om Ishanaya Namah – Salutations to Ishan, the Supreme Ruler and Divine Form of Shiva

रावण ने मुँह खोला। और दया की माँग की बजाय — उसने गाया।

उसने शिव ताण्डव स्तोत्रम् उसी क्षण रचा। अपनी सबसे पूर्ण पराजय के क्षण में। उस पर्वत के नीचे दबे हुए जिसे उसने उठाने की कोशिश की थी। संस्कृत साहित्य में शिव की सबसे प्रसिद्ध स्तुति — सत्रह पद जो उस क्षण की पूर्ण स्थिरता में रावण के मुख से निकले।

शिव द्रवित हो गए। उन्होंने रावण को मुक्त किया। उसे चन्द्रहास खड्ग उपहार में दिया।

यही है ॐ ईशानाय नमः।

ईशान — वो मुख जो सब देखता है — अहंकार को बाहर से दंड नहीं देता। वो बस अहंकार को उसके स्वाभाविक अंत तक पहुँचने देता है। रावण अपने पतन से ठीक पहले कभी इतना शक्तिशाली नहीं था। पतन के ठीक बाद कभी इतना पराजित नहीं था। और उस पूर्ण पराजय के क्षण में — जब सारा अहंकार जा चुका था और केवल सच्चा प्रेम बचा था — कभी इतना सच्चा नहीं था।

और इसीलिए… ऐसा माना जाता है… कि जब हम ॐ ईशानाय नमः जपते हैं — हम शिव के उस मुख को स्वीकार कर रहे हैं जो हमें पूरी तरह देखता है। केवल वो हिस्से नहीं जिन पर हमें गर्व है। केवल वो हिस्से नहीं जो हम दुनिया को दिखाते हैं। सब कुछ। महानता भी। अहंकार भी। भय भी। और वो प्रेम भी जो सब के नीचे है।

ईशान सभी दिशाएँ एक साथ देखता है। उन दिशाओं सहित जो हम चाहते हैं कि देखी न जाएँ।

और फिर भी — वो मुँह नहीं फेरता।

इस कथा का मूल आधार शिव महापुराण और वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड से जुड़ा माना जाता है। रावण का ईशान मुख की ओर देखने का विशेष वर्णन भक्ति परंपरा में इस प्रकार जोड़ा जाता है।

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