भगवान शिव के सबसे उष्ण और सबसे आनंदमय रूप को समझना हो तो यह नाम सीखिए। शंकर।
यह कोई उग्र नाम नहीं है। यह विनाश या ब्रह्मांडीय शक्ति का नाम नहीं है। शंकर वो नाम है जो आपकी दादी माँ रसोई में गुनगुनाती हैं। जो भारतीय राजमार्गों पर ट्रकों के पीछे लिखा मिलता है। जो गाँव के बच्चे त्योहारों में अर्थ जाने बिना पुकारते हैं। क्योंकि शंकर — घर जैसा लगता है। शंकर — गर्माहट जैसा लगता है। और यही भावना इस नाम का अर्थ भी है।
शंकर दो संस्कृत शब्दों से बना है। शम् — यानी सुख, कल्याण और शांति। कर — यानी करने वाला, देने वाला। तो शंकर का अर्थ है — सुख का रचयिता। कल्याण देने वाला। जो भी जाएँ वहाँ शांति लाने वाला। शिव शंकर यानी — शुभ सुख के रचयिता। और जय शिव शंकर यानी — उन शुभ सुख के रचयिता की जय जो सारी सृष्टि को आशीर्वाद देते हैं।

आदि शंकराचार्य और उनकी माँ की कहानी
कुछ शिव भक्त एक ऐसी कथा सुनाते हैं जो माधवाचार्य द्वारा रचित शंकरदिग्विजय — आदि शंकराचार्य की विस्तृत जीवनी — से जुड़ी मानी जाती है।
कुछ विवरणों के अनुसार — शंकराचार्य का जन्म केरल में लगभग 788 ईसवी में हुआ। उनकी माँ आर्यम्बा ने उनका नाम शंकर रखा — स्वयं भगवान शिव के नाम पर। जन्म के उसी क्षण से उन्होंने अपने पुत्र को महादेव को समर्पित कर दिया। यह नाम केवल नाम नहीं था। यह एक प्रार्थना थी। एक घोषणा थी। शंकर — शुभ करने वाले। शंकर की कृपा को इस संसार में लाने वाले।
बाल्यकाल में ही शंकराचार्य ने संन्यास ले लिया। माँ ने आँसुओं के साथ अनुमति दी। वो घर छोड़कर चले गए और भारत के सबसे महान दार्शनिक बने। सोलह वर्ष की आयु तक उन्होंने ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों पर भाष्य लिख दिए जो आज भी विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते हैं।
लेकिन शंकर के अर्थ की सबसे गहरी झलक उनके दर्शन में नहीं — बल्कि उनकी माँ की मृत्यु के समय मिलती है।
शंकराचार्य केरल वापस आए। माँ आर्यम्बा वृद्ध और निर्बल थीं। भयभीत थीं। कुछ विवरणों के अनुसार उन्होंने पूछा — बेटा, क्या जाते वक्त महादेव मेरे साथ होंगे?
शंकराचार्य उनके पास बैठ गए। उनका हाथ थाम लिया। और धीरे से जपने लगे —
ॐ नमः शिवाय। ॐ शंकराय नमः। जय शिव शंकर।
कहा जाता है — जो वहाँ उपस्थित थे उन्होंने कहा कि कमरे में एक अद्भुत शांति भर गई। माँ की साँसें धीमी और शांत हो गईं। उन्होंने बेटे का चेहरा देखा। मुस्कुराईं। और शंकर के नाम के साथ इस संसार से विदा हो गईं।
लेकिन कहानी यहाँ समाप्त नहीं होती। परंपरागत आपत्तियों के कारण गाँव वालों ने अंत्येष्टि में सहायता करने से मना कर दिया। एक संन्यासी को पारिवारिक अनुष्ठान करने का अधिकार नहीं माना जाता था।
शंकराचार्य ने अकेले किया। अपने हाथों से। उसी छोटे से आँगन में जहाँ वो पैदा हुए थे। लकड़ियाँ इकट्ठा कीं। अग्नि प्रज्वलित की। और पूरे समय शिव का नाम जपते रहे।
कुछ भक्तों के अनुसार उन्होंने बाद में लिखा — उस क्षण मुझे समझ आया कि शंकर का वास्तविक अर्थ क्या है। विनाशक नहीं। दूर पर्वत पर बैठे तपस्वी नहीं। बल्कि वो — जो उपस्थित रहते हैं। जो साथ रहते हैं। जो हर प्राणी को हर मोड़ पर — अंतिम मोड़ पर भी — साथ देते हैं। यही है शंकर। वो अनुग्रह जो छोड़कर नहीं जाता।
इसीलिए ऐसा माना जाता है कि शंकर नाम में एक ऐसी उष्णता है जो शिव के किसी और नाम में उस तरह नहीं है। क्योंकि शंकर दूर के शिव नहीं हैं। शंकर पास के शिव हैं। आपकी रसोई में। आपके परिवार में। आपके दुख में। आपके साधारण दिन में। वो मंदिर में आपकी प्रतीक्षा नहीं कर रहे। वो पहले से कमरे में हैं।
हर हर महादेव — योद्धा का जयघोष है। ॐ नमः शिवाय — ध्यानी की प्रार्थना है। लेकिन जय शिव शंकर — साधारण मनुष्य का गीत है। किसान का। व्यापारी का। विद्यार्थी का। दादी माँ का। शंकर सबके हैं — बिना किसी अपवाद के।
आज जय शिव शंकर गाइए। औपचारिकता से नहीं। अनुष्ठान से नहीं। बस मुस्कान के साथ और हृदय में उष्णता लेकर। जैसे उस प्रिय पुराने मित्र को बुला रहे हों जो हमेशा सब ठीक कर देते हैं। क्योंकि शंकर वही हैं।
इस कथा का आधार शंकरदिग्विजय से जुड़ा माना जाता है। कुछ विवरण और वर्णन भक्ति परंपरा में इस प्रकार सुनाए जाते हैं।
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