जय कैलाशपति (Jai Kailashpati) — वो 1 राजा जिसने शिव का पर्वत उठाने की कोशिश की

इस संसार में कुछ स्थान किन्हीं लोगों के इतने पूर्ण रूप से होते हैं कि वो स्थान उनके बिना वो नहीं रहता जो वो है।

कैलाश ऐसा ही स्थान है। और शिव वो हैं।

माउंट कैलाश — पश्चिमी हिमालय में, चार महान नदियों से घिरा, उसकी चोटी बर्फ और पत्थर का एक पूर्ण पिरामिड — केवल वो पर्वत नहीं है जहाँ शिव रहते हैं। यह ब्रह्मांड की धुरी है। पृथ्वी और स्वर्ग का मिलन बिंदु। वो शांत केंद्र जिसके इर्द-गिर्द सारी सृष्टि घूमती है। और यह सब कुछ इसलिए है क्योंकि शिव इसके स्वामी हैं। शिव को हटाइए — कैलाश केवल एक पर्वत है। शिव के साथ — यह अस्तित्व का सिंहासन है।

यही हैं कैलाशपति।

कैलाश — परमानंद का निवास। पति — स्वामी, वो जिनमें सार्वभौमत्व वास्तव में निवास करता है। एक साथ: वो जिनका कैलाश पर स्वामित्व निवास का विषय नहीं, सार का विषय है। शिव कैलाश पर उस तरह नहीं हैं जैसे एक राजा अपने महल में होता है। शिव कैलाशपति उस तरह हैं जैसे सूर्य प्रकाश के स्वामी हैं — क्योंकि उनके बिना वो चीज़ वो नहीं होती जो वो है।

Jai Kailashpati – Victory to the Lord of Mount Kailash
Jai Kailashpati – Victory to the Lord of Mount Kailash

रावण और कैलाश की कहानी — शिव पुराण से

शिव पुराण, रुद्र संहिता के अनुसार — और वाल्मीकि रामायण में भी जिसका संदर्भ है — रावण, लंका का महान राजा, सारी सृष्टि में सबसे असाधारण प्राणियों में से एक था।

वो केवल शक्तिशाली नहीं था। विद्वान था — वेदों का पारंगत, असाधारण क्षमता का संगीतज्ञ, बचपन से शिव का भक्त। दस सिर थे — हर एक स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र ज्ञान, स्वतंत्र भक्ति में सक्षम। देवताओं से लड़ा और जीता। भीषण तपस्या से ब्रह्मा से वरदान पाए। तीनों लोकों में देवताओं के बाद सबसे दुर्जेय प्राणी था।

और फिर भी।

रावण में एक गुण था जो उसकी सारी महानता के साथ एक छाया की तरह बैठा था — उसकी शक्ति के अनुरूप अहंकार। यह भाव कि अगर मैं कुछ कर सकता हूँ तो करके दिखाना चाहिए।

एक दिन रावण हिमालय से गुजर रहा था और कैलाश पर आया। इस श्वेत शिखर को देखा — ब्रह्मांड की इस धुरी को, जिस पर उसने जीवन भर पूजा की थी — और उसके विशाल, गर्वीले, प्रतिभाशाली, दोषपूर्ण मन में एक विचार आया।

मैं रावण हूँ। मैंने तीनों लोक जीते हैं। मुझे यह पर्वत लंका ले जाना चाहिए। तब शिव लंका में सदा उपस्थित रहेंगे।

भाव के पीछे की भक्ति सच्ची थी। रावण वास्तव में शिव से प्रेम करता था। लेकिन उसमें गुंथा अहंकार भी उतना ही सच्चा था।

तो उसने हाथ बढ़ाया। अपनी बीस भुजाएँ माउंट कैलाश के नीचे लगाईं। और उठाने लगा।

पर्वत हिला।

शिव पुराण के अनुसार — कैलाश वास्तव में काँपा। पार्वती, जो शिव के साथ पर्वत की चोटी पर बैठी थीं, चौंक गईं। उन्होंने शिव की बाँह थामी। और शिव ने — अपना ध्यान भंग किए बिना, उठे बिना, शक्ति के किसी विस्तृत प्रदर्शन के बिना — बस अपना अँगूठा नीचे दबाया।

बस अँगूठा।

कैलाशपति के एक अँगूठे का हल्का दबाव।

पर्वत अचल हो गया।

रावण ने अपनी बीसों भुजाओं से जोर लगाया। हर नस, हर अलौकिक मांसपेशी, देवताओं को परास्त करने वाली वो असाधारण शक्ति — सब कुछ पर्वत के विरुद्ध लगाया। पर्वत नहीं हिला। हिल नहीं सकता था। हिलेगा नहीं था। क्योंकि कैलाशपति ने अपने अँगूठे से दबाया था — और जो कैलाशपति थामें, उसे सृष्टि की कोई शक्ति नहीं हिला सकती।

रावण की भुजाएँ पर्वत के भार तले दब गईं। वो फँस गया। और शिव पुराण के अनुसार — वो हज़ार वर्षों तक फँसा रहा।

उस पर्वत के नीचे हज़ार वर्ष — जिसके स्वामी पर अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश की थी।

और उन हज़ार वर्षों में — रावण बदला।

जो अहंकार कैलाश उठाने को झुका था वो उस पर्वत के भार तले धीरे-धीरे गला जो नहीं हिला। जो गर्व सोचता था — मैं रावण हूँ, मैं यह कर सकता हूँ — वो किसी से नहीं टकराया। कोई शत्रु नहीं। कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं। बस — कैलाशपति की अचल सार्वभौमिकता।

और जब समझ आई — जब रावण ने अपने दस प्रतिभाशाली मस्तिष्कों से नहीं, हृदय से समझा कि कैलाश क्यों नहीं हिला — तो वो गाने लगा।

उन वर्षों में उसने वो रचा जिसे शैव परंपरा उसे देती है — शिव तांडव स्तोत्र। शिव की स्तुति में पद के बाद पद — उन जटाओं के लिए जिनमें गंगा बहती है, तीसरे नेत्र के लिए, अर्धचंद्र के लिए, डमरू के लिए, सर्पों के लिए, श्मशान के लिए, उस अचल, अहिल सार्वभौमत्व के लिए जिसने हज़ार वर्ष रावण को याद दिलाया कि सच्ची शक्ति क्या होती है।

जब शिव तांडव स्तोत्र पूर्ण हुआ — जब रावण की स्तुति अपने पूर्ण रूप में उठी — शिव ने अँगूठा उठाया।

पर्वत ने रावण को मुक्त किया।

और शिव ने, रावण की भक्ति की गहराई से प्रसन्न होकर, उसे एक उपहार दिया। नया नाम। दशग्रीव — दस सिर वाला — रावण बना। वो जिसकी चीख ने लोकों को हिलाया। क्योंकि कैलाशपति के पर्वत के नीचे रची शिव तांडव स्तोत्र की चीख इतनी शक्तिशाली थी कि शिव के हृदय तक पहुँची।

यही है कैलाशपति की कहानी। वो स्वामी जिनका अपने पर्वत पर सार्वभौमत्व इतना पूर्ण, इतना सहज है कि केवल एक अँगूठे से काम हो जाता है। कोई युद्ध नहीं। शक्ति का कोई विस्तृत प्रदर्शन नहीं। एक अँगूठा। हल्के से नीचे।

क्योंकि कैलाश शिव का उस तरह नहीं है जैसे कोई वस्तु किसी की होती है। कैलाश, कैलाश है क्योंकि शिव उसके स्वामी हैं। वो अलग नहीं हो सकते। वो एक हैं।

और इसीलिए — जब रावण ने उन्हें अलग करने की कोशिश की — पर्वत नहीं हिला।

जय कैलाशपति। 🙏

रावण और माउंट कैलाश की यह कथा शिव पुराण, रुद्र संहिता में वर्णित है और वाल्मीकि रामायण में भी इसका संदर्भ है। शिव तांडव स्तोत्र शैव परंपरा में रावण को दिया जाता है।

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