किसी के द्वारा शांति देने और स्वयं शांति का स्रोत होने में फर्क होता है।
एक वैद्य दवाई देता है। लेकिन स्वास्थ्य इससे गहरी चीज़ है। एक मित्र दिलासा देता है। लेकिन वो दिलासा गुज़र जाता है। हम जिसकी तलाश में हैं — हर प्रार्थना के नीचे, हर मंत्र के नीचे, हर भक्ति के नीचे — वो कोई बाहर से मिलने वाली चीज़ नहीं है। हम उस स्रोत को खोज रहे हैं। वो स्थान जहाँ से कल्याण आता नहीं — जहाँ कल्याण बस है।
उस स्रोत का एक नाम है। शम्भु।
और ॐ शम्भवे नमः का अर्थ है — मैं उस एक को नमस्कार करता हूँ जो कल्याण का दाता नहीं बल्कि समस्त कल्याण का स्रोत है।
शम्भु का अर्थ
शम्भु दो अत्यंत प्राचीन संस्कृत मूल शब्दों से बना है। शम् — यानी कल्याण, शांति, वो गहरी प्रसन्नता जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं। और भू — यानी जो है, जो सब का आधार है, जो सब का स्रोत है।
शम्भु का अर्थ वो नहीं जो शांति उपहार की तरह बाँटता हो। शम्भु वो है — जिनका अस्तित्व ही वो स्रोत है जिससे ब्रह्मांड की समस्त शांति, समस्त सुख, समस्त कल्याण प्रवाहित होता है। किसी भी मनुष्य ने जो भी सच्ची शांति कभी अनुभव की है — प्राचीन परंपरा की समझ के अनुसार — वो शम्भु था। शम्भु का उपहार नहीं। स्वयं शम्भु।
यह नाम कृष्ण यजुर्वेद के श्री रुद्रम् में मिलता है। हज़ारों वर्षों से मानव कंठों पर रहा है। और एक कहानी है जो इसके अर्थ को किसी भी व्याख्या से अधिक पूर्णता से प्रकट करती है।
हलाहल की कथा — भागवत पुराण और शिव महापुराण से
भागवत पुराण, शिव महापुराण और विष्णु पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार — एक ब्रह्मांडीय युग में देवताओं और असुरों ने मिलकर महासागर का मंथन करने का निर्णय लिया। वो अमृत खोजना चाहते थे — जो उसकी गहराइयों में छिपा था। मंदर पर्वत मंथन-दंड बना। महासर्प वासुकि रज्जु बना। देवता एक ओर से खींचते। असुर दूसरी ओर से। और महासागर का मंथन शुरू हुआ।
गहराइयों से अनेक खज़ाने निकले। दिव्य वैद्य धन्वंतरि। कल्पतरु। स्वयं लक्ष्मी। एक-एक करके मंथित सागर के उपहार ऊपर आते गए।
और फिर कुछ और निकला।
जिसकी अपेक्षा नहीं थी। जिसकी किसी ने योजना नहीं बनाई थी।
हलाहल।
ब्रह्मांडीय विष। अनंत युगों में सृष्टि की गहराइयों में जमा हुआ समस्त अंधकार और विषाक्तता — एक भयंकर, अभिभावक करने वाली लहर में ऊपर आ गई। उसकी गंध मात्र से जीव नष्ट होने लगे। उसकी उपस्थिति मात्र से सृष्टि विखंडित होने लगी। देवता भाग गए। असुर भाग गए। ब्रह्मांड का हर प्राणी भाग गया।
क्योंकि हलाहल का कोई प्रतिकार नहीं था। उसे रोकने का कोई अनुष्ठान नहीं था। सृष्टि में कोई शक्ति नहीं थी जो उसे निष्प्रभावी कर सके।
कुछ विवरणों के अनुसार — उस पूर्ण सार्वभौमिक संकट में एक मौन छा गया। और उस मौन से एक आकृति आई जो भागी नहीं।
शिव उस हलाहल की ओर चले।

उन्होंने उसे अपनी हथेलियों में लिया। उसे देखा। और पी लिया।
इसलिए नहीं कि उन्हें करना था। इसलिए नहीं कि किसी ने कहा था। इसलिए — क्योंकि कोई और नहीं कर सकता था। और किसी को करना था। और शम्भु — समस्त कल्याण के स्रोत — सृष्टि के समस्त विष को अपने भीतर ले सकते थे बिना वो बने जो वो हैं उससे कम हुए।
कुछ विवरणों के अनुसार — पार्वती यह देखकर कैलाश से दौड़ती हुई आईं और जिस क्षण उन्होंने निगला — उन्होंने दोनों हाथों से उनका गला थाम लिया। विष वहीं रुक गया — उनके कंठ में। न आगे गया। न वापस संसार में निकला। वहीं रहा। हमेशा के लिए। उनके कंठ को रात के आकाश जैसा गहरा नीला कर गया।
इसीलिए शिव नीलकंठ भी कहलाते हैं। जो संसार का विष अपने कंठ में रखते हैं — ताकि संसार कुशल रहे।
और यही — कुछ शिव भक्तों के अनुसार — शम्भु के अर्थ की सबसे पूर्ण अभिव्यक्ति है।
शम्भु इसलिए कुशल नहीं हैं कि उन्हें कुछ बुरा कभी छुआ नहीं। शम्भु इसलिए कल्याण के स्रोत हैं — क्योंकि उन्होंने वो सब अपने भीतर ले लिया जो कल्याण को नष्ट करता है। और फिर भी वो रहे।
और इसीलिए… ऐसा माना जाता है… कि जब आपके जीवन में आपका हलाहल आए — वो जमा हुआ दुख, वो विषाक्तता, वो अंधकार जो आपने माँगा नहीं था — तब ॐ शम्भवे नमः जपना यह माँगना नहीं है कि शिव दर्द हटा दें। यह पहचानना है कि जिसे आप बुला रहे हैं उसने इससे कहीं बुरा अपने भीतर ले लिया था। और कल्याण का स्रोत बने रहे।
यही है शम्भु। अंधकार से अछूते नहीं। अंधकार से अप्रभावित।
इस कथा का मूल आधार भागवत पुराण, शिव महापुराण और विष्णु पुराण में मिलता है। पार्वती और शिव के बीच का संवाद और कुछ विवरण भक्ति परंपरा में इस प्रकार सुनाए जाते हैं।
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