सब कुछ गतिशील है।
केवल जीवित प्राणी नहीं। केवल वायु और जल नहीं। सब कुछ। परमाणु। तारे। आकाशगंगाएँ। वो धरती जो इतनी स्थिर लगती है — गतिशील है। वो विचार जो इतने ठोस लगते हैं — गतिशील हैं। सृष्टि की हर प्रत्यक्षतः स्थिर चीज़ — निरंतर, अनवरत, लयबद्ध गति में।
हिंदू परंपरा ने अस्तित्व के इस मूलभूत सत्य को देखा और उसे एक नाम दिया। ब्रह्मांड की गति को नृत्य कहा। और नर्तक को — नटराज।
नृत्य के राजा। समस्त ब्रह्मांडीय गति के स्वामी। जिनकी लय ब्रह्मांड की धड़कन है।
नटराज नाम का अर्थ
नट — संस्कृत से — नर्तक, अभिनेता, वो जिसमें गति और अभिव्यक्ति पूर्णतः एकीकृत हैं। राज — राजा, स्वामी।
एक साथ — नटराज — केवल एक नर्तक राजा नहीं। वो जिनका नृत्य ही समस्त सृष्टि पर सार्वभौमत्व का कार्य है। क्योंकि शैव दर्शन में — शिव केवल नृत्य नहीं करते। उनका नृत्य ही सृजन है। उनका नृत्य ही विनाश है। उनका नृत्य ही समस्त अस्तित्व को उसके निरंतर प्रवाह में बनाए रखने का क्षण-प्रतिक्षण का कार्य है।
नृत्य रोकना ब्रह्मांड रोकना होगा।
आनंद तांडव की कहानी — स्कंद पुराण से
स्कंद पुराण के चिदंबरम माहात्म्य के अनुसार — और समस्त शैव आगम परंपरा में स्थापित — एक बार तिल्लई नामक एक महान वन था, जो अब तमिलनाडु के चिदंबरम में है, जहाँ ऋषियों का एक समुदाय तप करता था।
ये ऋषि विद्वान थे। गहरे विद्वान। वेदों में, अनुष्ठान में, दर्शन में पारंगत। और अपनी विद्वता में — वो उस विश्वास पर पहुँचे थे जो अपने ढंग से सबसे सूक्ष्म और सबसे खतरनाक अज्ञान था। वो मानते थे कि अपने ज्ञान, अपने अनुष्ठान, अपनी सही विधि से — वो स्वयं ब्रह्मांड की शक्तियों को नियंत्रित कर सकते हैं।
उन्होंने अपने नक्शे को भूभाग समझ लिया था।

इस वन में — चिदंबरम माहात्म्य के अनुसार — शिव आए। वो अपने भयावह रुद्र रूप में नहीं आए, अपने ध्यानस्थ दक्षिणामूर्ति रूप में नहीं आए, बल्कि ऐसे तेजस्वी, अभिभूत करने वाले सौंदर्य के रूप में आए कि ऋषि रुक गए। साथ में विष्णु थे जिन्होंने मोहिनी का रूप लिया था — और इस संयोजन ने ऋषियों को विचलित किया और कुछ वर्णनों में उनमें क्रोध और आहत गर्व की प्रतिक्रिया उत्पन्न की।
और तब ऋषियों ने अपनी विद्वता को शस्त्र की तरह इस्तेमाल किया।
उन्होंने एक महान यज्ञ किया और उसकी अग्नि से शिव पर भेजा — एक महान सर्प। एक बाघ। और एक भयावह बौना दैत्य — अपस्मार। अज्ञान का दैत्य। विस्मरण का दैत्य। उस असावधानी का दैत्य जो भुला देती है कि वास्तविक क्या है।
शिव ने सब कुछ पूर्ण शांति से ग्रहण किया।
सर्प को उठाकर गले में आभूषण की तरह धारण किया। बाघ को पकड़कर उसकी खाल उतारी और वस्त्र की तरह पहन ली। और बौने दैत्य अपस्मार को — अज्ञान को — शिव ने अपने दाहिने पाँव से दबाया। हल्के से लेकिन पूर्णतः। उसे अपने पाँव के नीचे दबाए रखा।
और फिर — अज्ञान के दबे शरीर पर खड़े होकर — शिव ने नृत्य शुरू किया।
आनंद तांडव। आनंद का नृत्य।
और जैसे-जैसे शिव तिल्लई वन में नृत्य करते रहे — चिदंबरम माहात्म्य और शैव आगम परंपरा के अनुसार — ऋषियों ने उनके नृत्यमान रूप की गति में समस्त अस्तित्व का पूरा सत्य प्रकट होते देखा।
ऊपरी दाहिने हाथ में — डमरू। उसकी ध्वनि सृजन की ध्वनि है — वो प्रथम कंपन जिससे समस्त अस्तित्व उभरता है। डमरू की हर थाप एक ब्रह्मांड का जन्म है।
ऊपरी बाएँ हाथ में — अग्नि। विसर्जन की लौ। जो जन्मता है वो समाप्त भी होता है। डमरू सृजन करता है। अग्नि विसर्जित करती है। एक ही नर्तक के दो हाथों में। एक ही नृत्य में। सृजन और विनाश विरोधी नहीं — एक ही नर्तक के दो हाथ।
निचला दाहिना हाथ — अभय मुद्रा। भय मत करो। सृजन और विसर्जन के बीच भी — तुम धारण किए गए हो। नर्तक जानता है हर कदम कहाँ पड़ेगा।
निचला बायाँ हाथ — उठे हुए बाएँ पाँव की ओर संकेत करता। यहाँ देखो। यह उठा हुआ पाँव — यह कृपा है। यह मुक्ति है। अनंत चक्र से बाहर का रास्ता है। और यह स्वतंत्र रूप से दिया जाता है — कृपा से — उस उठे हुए पाँव से — हर उस आत्मा को जो नर्तक को पहचान ले।
दाहिने पाँव के नीचे — अपस्मार। अज्ञान का बौना। शिव अज्ञान पर नृत्य करते हैं। उसे नष्ट करने के लिए नहीं — अपस्मार इस कहानी में कभी नहीं मारा जाता। दबाया जाता है। जागरूकता के नर्तक के पाँव के नीचे रखा जाता है — ताकि सृजन का नृत्य जारी रह सके।
चारों तरफ — प्रभामंडल। अग्नि का वलय। ब्रह्मांड की सीमा। वो वृत्त जिसके भीतर समस्त सृजन, समस्त विसर्जन, समस्त नृत्य होता है।
और केंद्र में — शिव। नटराज। नृत्यमान।
तिल्लई वन के ऋषियों ने — चिदंबरम माहात्म्य के अनुसार — नृत्य में यह सब देखा। और देखकर समझे। अपनी विद्वता से नहीं। हृदय से। समझे कि ब्रह्मांड कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे मानवीय ज्ञान से नियंत्रित किया जा सके। यह एक नृत्य है। और नर्तक शिव हैं। और नृत्य के प्रति एकमात्र सही प्रतिक्रिया नियंत्रण नहीं — पहचान है। समर्पण। जय नटराज का नमन।
वो स्थान जहाँ शिव ने तिल्लई वन में नृत्य किया — चिदंबरम बना। नृत्यमान शिव का मंदिर। और उसके हृदय में — आज भी — नटराज रूप। नृत्यमान शिव। नृत्य के राजा।
जय नटराज। किसी नर्तक को प्रणाम नहीं। यह पहचान है कि आप उस नृत्य के भीतर जी रहे हैं।
आनंद तांडव की यह कथा स्कंद पुराण के चिदंबरम माहात्म्य में और समस्त शैव आगम परंपरा में स्थापित है। नटराज रूप और उसकी आइकनोग्राफिक धर्मशास्त्र शैव सिद्धांत की आधारशिला है।
क्या आप शिव के मंत्र हर वक्त सुनना चाहते हैं? तो MySacredSolutions.in पर विभिन्न sacred games खेलिए — जिन्हें खेलते-खेलते आप शिव मंत्रोच्चार भी कर सकते हैं।
Play Sacred Games — and chant sacred names with every move.